"हम क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते, क्या संभव है और क्या नहीं, यह हमारे सामर्थ्य का ही असली कार्य है जो हमें विश्वास दिलाता है कि हम कौन हैं. "अक्सर दोस्तों में सुनने को मिल जाता है कि मैं क्या कर सकता हूँ ? मैं तो किसी काम के लायक ही नहीं, यह काम मुझसे नहीं हो सकता. और भी ऐसी कई बातें लोग तब करते हैं जब उनकी कोई कोशिश नाकामयाब होती है. उन्हें अपनी ही क़ाबलियत पर ही शक होने लगता है. वैसे हम सभी करना तो बहुत कुछ चाहते हैं और करते भी हैं. लेकिन कभी मनमुताबिक काम ना होने से निराशा भी होती है. ऐसे में कभी हालात और कभी हिम्मत जबाब दे जाती है. तो खुद को शक के घेरे में खड़े करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता शायद नज़र ना आता होगा.
ये आज के हालात हैं जहाँ मुझ जैसा हर युवा कही ना कहीं घर वालों को, दोस्तों को, दुनिया को कुछ कर दिखाना चाहता है.अपने आप को साबित करना चाहता है. इस भीड़ में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता है.जिसके लिए वो दुनिया से लड़ने को तैयार रहता है. इस लड़ाई में उसका सबसे बड़ा हथियार उसकी खुद कि काबिलियत ही होती है. जो उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है. सबसे पहले यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि आखिर वह किस काम के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त है , उसकी क्षमता उसे सबसे ज्यादा किस काम को करने के लायक बनाती है. जिस काम को करने में उसे मज़ा आये.. एक बार इस सवाल का जबाब मिल जाने पर लगन से उस काम को करने की देर होती है. बस फिर कुछ भी कर दिखाने से कोई उसे पीछे नहीं कर सकता है.
वैसे भी किसी मह्पुरुष ने कहा है
"काबिल बनो कामयाबी झक मार के पीछे आएगी"
ये महापुरुष कोई और नहींबल्कि फिल्म ३ idiot के बाबा झाँझन जी हैं. इन्होने वैसे गलत भी कुछ नहीं कहा है. आखिर कामयाबी पाने के लिए ही ये सारी मेहनत हो रही है. कामयाब होगे तभी तो कुछ कर पायेंगें से ज्यादा कुछ करेंगे तो कामयाब होगें, के बारे में पहले सोचना चाहिए. अगर खुद पर विश्वास है हम यह कर सकते हैं तो उसे करने का सामर्थ्य आ जाता है आखिर क़ाबलियत का तीर कामयाबी पर लगता जरूर है.जो कुछ नया या अलग करने की चाहत से अलग नहीं.
तो चलिए सामर्थ्य के पंख लगाकर रचना के आकाश में सफलता की उड़ान भरते हैं......
ये केवल शुरुआत है. अभी तो बहुत कुछ करना और कहना है.
